Tuesday , 25 September 2018

शाही स्नानों के लिए किराए पर बुलाए जाते हैं नागा बाबा

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महाकुंभ, अर्धकुंभ या फिर सिंहस्थ कुंभ में आपने नागा साधुओं को जरूर देखा होगा। कौन हैं ये नागा साधु, कहां से आते हैं और कुंभ खत्म होते ही कहां चले जाते हैं? इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं हैं। इन मेलों के दौरान लाखों की सख्या में नागा साधु कुंभ में आकर डुबकी लगाते हैं। लेकिन नागा साधुओं को लेकर जो हमारी कल्पना है वो सिर्फ पर्याप्त नहीं है।
कहते है कि ऐश-लिप्त नागा साधु अपने शरीर पर कोई कपड़ा नहीं पहनते हैं। लेकिन फुलों की माला और शरीर पर भस्म लगाकर भारी संख्या में कई अखाड़ों के बैनर पोस्टरों के साथ शाही स्नान करते हैं। वे नियमित रूप से हिंदू श्रद्धालुओं के लिए एक पहेली है साथ ही फोटोग्राफरों और विदेशी पर्यटकों के लिए भी एक जैसी तस्वीर है। फिर भी, कुंभ मेले का सबसे बड़ा आकर्षण नग्न नागा साधु ही होते हैं। कहां से आते हैं और पता नहीं कहां चले जाते हैं।
लेकिन एक अंग्रेजी वेबसाइट ओपन द मैगजीन  रिपोर्ट के मुताबिक, सभी नग्न नागा साधु असलियत में नागा सन्यासी नहीं होते है। इलाहाबाद कुंभ के दौरान नागा साधु बने कन्हैया लाल इसका जीत जागता उदाहरण है जो नागा नहीं है लेकिन वो जूना अखाड़े का हिस्सा है। जो कि सात दशनामी अखाडों में से एक हैं। जिसने इलाहाबाद कुंभ में 14 जनवरी को हुए शाही स्नान के दौरान संगम पर आस्था के नाम की डुबकी लगाई थी। जिसके लिए उसे 501 रुपये भी दक्षिणा के रूप में मिले थे।
बता दें कि कन्हैया लाल जो कि हरिद्वार का रहने वाला है। जहां वो भिक्षा पर निर्भर रहता है और साथी ही वहां ना ही रहना का कोई स्थायी स्थान है। वो कुंभ के दौरान ज्यादातर हर की पौड़ी घाट पर रहता है। इस दौरान खाने और रहने की पूरी सुरक्षा मिलती है। और कुछ दिनों तक, उन्हें भीख नहीं मांगने पड़ती है। कन्हैया आगे बताते है कि जब पिछली बार इलाहाबाद में कुंभ लगा था तब वो 13 जनवरी को हरिद्वार से आया था। और जूना अखाड़ा के शिवरों में रहा था। वो कहते है कि इसके लिए हमे जूना अखाड़ा से निमंत्रण मिला था।
यात्रा के दौरान कन्हैया के साथी गोपाल, इलाम और बल्लू भी जूना अखाड़ा द्वारा मिली जगह पर रह रहे हैं। जो जगह उन्हें कुंभ प्रशासन द्वारा दी गई थी। वो अपना ज्यादातर समय आराम, भंडारों में खाना पीना और दक्षिणा से करते हैं। दिन में कुछ घंटों के लिए वो नग्न संयासी बन जाते हैं। जिनसे उन्हे दान-दक्षिणा भी अच्छी मिल जाती है।
वो आगे कहते है कि अखाड़ों में नागा साधुओं के लिए भोजन की अनुमति नही है। लेकिन कुंभ से पहले, वो उन्हे निंमत्रण देते हैं। ना केवल ठहरने के लिए बल्कि भंडारों में खाने के लिए और भक्ति का हिस्सा बनने के लिए। बेशक, हम उसके लिए दक्षिणा मिलती है। हरिद्वार कुंभ (2010) में भी, हम जूना अखाड़ा के साथ रहे थे। यहीं वो समय होता है जब वो हमारा ध्यान रखते हैं। यहां हम एक से डेढ महीने तक रहते है जबतक की कुंभ खत्म नहीं हो जाता है। और उसके बाद हम वापस हरिद्वार चले जाते हैं। तो वही कन्हैया के मित्र गोपाल ने कहा कि अस्थायी नागा आपको कई अखाड़ों के शिवरों में मिल जाएंगे। आगे कहा कि हर की पौड़ी खाली हो चुकी है सब यहीं होंगे।
नागा इतिहास
लेकिन सबसे पहले वेद व्यास ने संगठित रूप से वनवासी संन्यासी परंपरा शुरू की। उनके बाद शुकदेव ने, फिर अनेक ऋषि और संतों ने इस परंपरा को अपने-अपने तरीके से नया आकार दिया। बाद में शंकराचार्य ने चार मठ स्थापित कर दसनामी संप्रदाय का गठन किया। बाद में अखाड़ों की परंपरा शुरू हुई। पहला अखाड़ा अखंड आह्वान अखाड़ा’ सन् 547 ई. में बना। इन सब अखाड़ों में जूना अखाड़ा सबसे बड़ा अखाड़ा है जिसमें भारी सख्या में नागा साधू आते हैं।

 

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