Saturday , 17 November 2018

भाजपा सरकार के ‘सबका साथ सबका विकास’ की खुली पोल, अल्पसंख्यक दिवस पर ही अल्पसंख्यकों की ये अनदेखी

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देहरादून- विश्व अल्पसंख्यक अधिकार दिवस (18 दिसंबर) सूबे में अल्पसंख्यक आयोग से धूमधाम से मनाया जा रहा था। कार्यक्रम में सूबे के मुखिया त्रिवेंद्र रावत अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवा रहे थे। भीतर जहां अल्पसंख्यकों के अधिकारों की पैरवी हो रही थी। ठीक इसके उलट कार्यक्रम स्थल के बाहर सूबे के सैकड़ों मदरसों के मजबूर अध्यापक दरख्वास्त लिए खड़े थे।

दरअसल ये वे अध्यापक हैं जो केंद्र सरकार की योजना  s.p.q.e.m. के तहत मदरसों में दीनी तालीम लेने वाले बच्चों को दुनियावी तालीम में हुनरमंद बनाते हैं। गजब की बात ये है कि पिछले 27 महीनों से इन अध्यापकों को उनका नियत मानदेय नहीं मिला।

इन अध्यापकों की दरख्वस्त कहती है कि पिछले 27 महीनों से मानदेय़ न मिलने के चलते जहां मदरसों के अध्यापकों के सामने भुखमरी की नौबत आ रखी है। वहीं अल्पसंख्यक अधिकार दिवस के मौके पर इनकी सूबे की सरकार से फरियाद है कि राज्य सरकार भी इनके लिए अपनी  झोली खोले और हर महीने 4 हजार रूपए की इमदाद बख्शे। अध्यापकों का कहना है कि 27 महीनों के रूके मानदेय के लिए वे सैकड़ों बार सचिवालय से लेकर अायोग के चक्कर काट चुके हैं बावजूद इसके उनकी फरियाद नक्कारखाने में तूती साबित हो रही है।

जरा सोचिए, जिन अध्यापकों का परिवार सिर्फ मानदेय की नकदी के भंरोसे अपने कई काम निपटाता हो पिछले 27 महीने से कितनी मुफलिसी में जी रहा होगा। उधार के तकादे सुन सुन कर कितनी जिल्लत झेल रहा होगा। ताज्जुब की बात तो ये है कि कार्यक्रम खत्म होने के बाद सूबे के सीएम त्रिवेंद्र रावत ने भी बाहर खड़े फरियादियों की फरियाद सुनना तो दूर उन पर नजरेंइनायत भी नहीं की।

यानि अल्पसंख्यक अधिकार दिवस के दिन भी अल्पसंख्यकों को सत्ता की चौखट से उदास लौटना पड़ा। साबित हुआ कि कि सत्ता की चाल और चरित्र में बड़ा फर्क होता है। भीतर जहां अल्पसंख्यकों के हितों की पैरवी हो रही थी वहीं बाहर उन्हें दुत्कार दिया गया था।

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