Wednesday , 25 April 2018

सुप्रीम कोर्ट ने उठाए सवाल- आपराधिक केस में सज़ा पाने वाला राजनीतिक पार्टी का पदाधिकारी कैसे बना रह सकता है…?

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नई दिल्ली – आपराधिक केस में सज़ा पाने वाले लोगों के राजनीतिक पार्टी का पदाधिकारी बने रहने पर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाए हैं।

कोर्ट ने कहा है कि सज़ा पाने वाला खुद चुनाव नहीं लड़ सकता लेकिन उसके पार्टी पदाधिकारी बने रहने या नई पार्टी बनाने पर कोई रोक नहीं, एक अपराधी ये तय करता है कि चुनाव में कौन लोग खड़े होंगे. कानून में ये बड़ी कमी है।

हालांकि, इस मामले की पिछली सुनवाई में कोर्ट ने कहा था कि वो सजायाफ्ता लोगों को पार्टी बनाने से रोकने पर सुनवाई नहीं करेगा, तब कोर्ट ने कहा था कि राजनीतिक दल बना कर अपने विचार लोगों तक पहुंचाने से किसी को नहीं रोका जा सकता। कोर्ट ने याचिका के सिर्फ एक बिंदु को सुनवाई लायक माना था, जिसमें चुनाव आयोग को पार्टियों का पंजीकरण रद्द करने का अधिकार देने की बात कही गई थी।

 

इसका जवाब देते हुए चुनाव आयोग ने कहा है कि वो पार्टियों का रजिस्ट्रेशन तो करता है, लेकिन चुनावी नियम तोड़ने वाली पार्टियों के खिलाफ कार्रवाई का उसे अधिकार नहीं है, इसके लिए कानून में बदलाव किया जाना चाहिए।

आयोग ने ये भी बताया है कि वो 20 साल से केंद्र सरकार से कानून में बदलाव का अनुरोध कर रहा है लेकिन सरकार ने इस मसले पर सकारात्मक रवैया नहीं दिखाया है। केंद्र सरकार ने अब तक मामले में जवाब दाखिल नहीं किया है, इस वजह से सुनवाई टल गई। कोर्ट ने सरकार से जल्द जवाब देने को कहा है।

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