Thursday , 15 November 2018

उत्तराखंड में बढ़ी ठंडक में सियासी पारा हुआ गर्म, सांसद रमेश पोखरियाल निवास पर क्यूँ लगा सूबे के मंत्रियों, विधायकों, नेताओं का अचानक जमावड़ा…?

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nishank
देहरादून– पूरे सूबे में मौसम के करवट के बाद ठंडक बढ़ गई है। लेकिन हरिद्वार सांसद रमेश पोखरियाल की बीते रोज परोसी चाय की चर्चा से फिजा का सियासी मौसम अब तक गर्म है।
 दरअसल, भाजपा के आजीवन सहयोग निधि संग्रह अभियान के समापन के बाद राष्ट्रीय सह महामंत्री संगठन शिवप्रकाश, पूर्व सीएम विजय बहुगुणा, पूर्व सीएम व सांसद भगत सिंह कोश्यारी, राज्य सरकार में काबीना मंत्री यशपाल आर्य, सांसद माला राज्यलक्ष्मी शाह के साथ ही करीब 45 विधायक और कई जिलों के अध्यक्ष पूर्व सीएम डॉ.निशंक के डालनवाला इलाके में मौजूद निवास पर एकत्र हुए।
चाय पार्टी के बहाने भाजपाई दिग्गजों व विधायकों के डॉ.निशंक के आवास पर जुटने के साथ ही सियासी हलकों में भी हलचल शुरू हो गई है। इस चाय पार्टी के क्या माएने है इसे तलाशने के लिए हर कोई कयास लगा रहा है। क्योंकि इस चाय पार्टी में सब थे लेकिन सूबे के मुखिया नहीं थे।
दरअसल सूबे में भाजपा की राजनीति के दो धुरंधर चाणक्यों में शुमार भगत दा और डा.निशंक की ये जुगलबंदी क्या गुल खिलाएगी इस पर सियासत में दिलचस्पी रखने वालों की पैनी निगाहें हाथों मे हाथ और मुस्कराहट के माएने खोज रही है।
सूबे के सियासी माहौल पर नजर डाली जाए तो बहुत कुछ ऐसा है जो संकेत देता है कि सब कुछ ठीक है लेकिन कुछ भी ठीक नहीं है। दरअसल लोकायुक्त के मसले पर खंडूड़ी साहब की खामोशी, अपने महकमों में सीएम के दखल से सतपाल महाराज और हरक सिंह रावत की नाराजगी। उधर ट्रांसपोर्टर प्रकाश पांडे की मौत के बाद किए वादे अब वादाखिलाफी में बदल गए है लिहाजा बंशीधर भगत खफा हैं। कई वरिष्ठ विधायक पार्टी के प्रति वफादारी के बावजूद अपनी अनदेखी से आहत हैं। कई समीकरण बिखरे हैं लिहाजा इस चाय की चर्चा जारी है।
माना जा रहा है कि केंद्र की राजनीति में वरिष्ठ और अनुभवी होने के बावजूद ज्यादा तवज्जो नहीं मिल रही है। जबकि इधर सूबे की राजनीति में भी नया नेतृत्व कुछ ज्यादा भाव नहीं दे रहा है। माहौल ये है कि 2019 का लोकसभा चुनाव करीब है जबकि राज्य में भाजपा सरकार को एक साल पूरा होने में कुछ ही वक्त रह गया है। वहीं निकाय चुनाव और पंचायत चुनाव के नगाड़े भी बज रहे हैं।
वैसे कहने वाले कह रहे हैं कि अगर ये वाकई में कोई आगामी चुनावी रणनीतिक बैठक थी या मंत्री मंडल विस्तार और दायित्वों के बंटवारे को लेकर कोई गोपनीय मीटिंग तो इतनी गंभीर बैठक से सीएम साहब क्यों नदारद थे।
बहरहाल चाय की चर्चाएं चुगली कर रही हैं कि चेले शक्कर बन गए हैं लिहाजा गुरुओं को डर है कि कहीं वे गुड़ बनकर न रह जाएं। क्योंकि बदलती भाजपा में देखने वालों ने जबरन पितृपुरुष बनते हुए भी देखा है।
हालांकि चर्चा ये भी है कि दोनों दिग्गजों ने चाय के बहाने संकेत दिए हैं कि दिल्ली में दाखिल होने का ये मतलब नहीं कि सूबे मे उनका जलवा कम है। बेशक सत्ता हाथ मे न हो सूबाई संगठन मे उनकी ौपूरी पकड़ है। ऊपर से 2007 का इतिहास भी प्लस प्वांइट है।

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